Monday, September 24, 2012

किताबों में पन्नों के निशाँ बोलते हैं

किताबों में पन्नों के निशाँ बोलते हैं,
कभी इस जगह उसकी यादें बसी थीं |

यूँ ही अश्क आँखों से झरे तो न होंगे,
कहीं यादें उसकी फिर तार-तार हुई थीं |

तसव्वर में उसने जब हँसते ही देखा
लगा हाथ में गम की लकीरें सजी थीं |

निगाहों में गम के कुछ बादल घिरे हैं
वज़ह कुछ तो होगी जो आँख में नमीं थी |

मौत की क्या जुर्रत जो उसे घेर लेती
मुकद्दर दीये का अब लौ की कमी थी |

_________हर्ष महाजन