Saturday, May 5, 2012

मैं तो तन्हाईयों का तलबगार हूँ

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मैं तो  तन्हाईयों का तलबगार हूँ 
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

था काफिर सनम वो जुदा क्या हुआ
गर हुआ भी जुदा तो जुदा क्या हुआ।
या खुदा क्या कहूं उसका ही प्यार हूँ
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

हम क्या हैं हमारी औकात है क्या ,
जो भी है 'हर्ष' का, है उसी का दिया ,
उसके गाँव औ शहर का मैं बीमार हूँ ,
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

अब ज़बीं पर भी सजदा उसी का रहे
गर मुमकिन नहीं ये तो ज़िन्द न रहे,
सर कलम भी करे और कहे यार हूँ
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

मस्जिदों में अजाँ मंदिरों में शंख-नाँ(शंख-नाद)
किस तरह पत्थरों में भरी उसने जाँ,
वो कहे मुझ में, मैं उसका अवतार हूँ ,
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।


____________हर्ष महाजन ।



ज़बीं=मस्तक